Sunday, March 7, 2010

फिर दिल दिया और टूट गया......
पहले वीरेंदर सहवाग ,फिर राज्यवर्धन राठौर और अभिनव बिंद्रा भी। जी हाँ तमाम भारतीय सितारों ने भारतीय हॉकी को रसातल से उबारने के लिए जोर शोर से कहा की फिर दिल दो हॉकी को । क्रिकेट की खुमारी में डूबी जनता ने भी रास्ट्रीय खेल के प्रति पूरी निष्ठा दिखाई । दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में अपेक्षा से अधिक लोगों ने भारतीय टीम का हौंसला बढ़ने के लिए अपनी उपस्तिथि दर्ज की। दरअसल लगातार गर्त में डूबती जा रही हॉकी को फिर से जिन्दा करने के लिए इस तरह का सपोर्ट भी जरूरी था । सभी हॉकी प्रेमी मैदान पर या टी वी पर हॉकी की गरिमा को जिन्दा रखने के लिए अपना समय देते रहे। और जब हमने पकिस्तान को पहले ही मैच में धो दिया तो जज्बा और भी बढ़ गया , पूरा हिन्दुस्तान सब कुछ भूलकर ये कहने लगा की अब दिल दो हॉकी को । शायद हमने ये उम्मीद लगा दी थी की अब तो बाजी हम ही मारेंगे। पर उसके बाद क्या हुआ सभी जानते हैं। पकिस्तान पर हमारी जीत की खुमारी को ऑस्ट्रेलिया ने अगले ही दिन उतार दिया । शर्मनाक तो ये रहा की हम कमजोर डिफेंस के कारण६ मिनट में ही २ गोल खा बैठे। उसके बाद भी हमने पेनाल्टी कॉर्नर गवाए । और मैच ५-३ से हार गए । यही सिलसिला स्पेन के साथ भी रहा यहाँ भी गोल का अंतर इतना ही था। और यहाँ भी हमने कई गलतियाँ की। रही सही कसार इंग्लैंड ने हमें ३-२ से धोकर पूरी कर दी । इन तीनो मैचों में हमारा डिफेंस बेहद खराब था जो की यूरोपीय खिलाडियों के लिए एक अच्छा संकेत था और वो गोल पर गोल दागते रहे।
टीम इंडिया सेमी फ़ाइनल में पहुँचने की आस तो पहले ही खो चुकी थी लेकिन अब इंग्लैंड से हारकर अंतिम ८ के लिए भी संघर्ष कर रही है।
कहने की जरूरत नहीं कि टीम के इस प्रदर्सन से लाखों हॉकी प्रेमियों को कितना दुःख हुआ । जो लोग हॉकी को दिल देने के लिए बेक़रार थे अब उनका दिल टूट चुका है । तमाम विवादों में पहले से घिरी हॉकी के लिये ये प्रदर्शन जले पर नमक छिड़कने जैसा ही है और इसके जिम्मेदार सिर्फ खिलाडी ही हैं।

Friday, March 5, 2010

पॉलिटिक्स में यू टर्न

संसद में इस बजट सत्र में कुछ अजीबोगरीब हालत देखने को मिले । जिस बात की कभी आशंका नहीं की जाती थी महंगाई ने वो सब कर दिखाया। कल तक एक दूसरे के धुर विरोधी रहे भगवा ब्रिगेड और वाम दल अचानक मांगे के मुद्दे पर एकजुट दिखे । यही नहीं इस मुददे पर समाजवादी पार्टी और राजद जैसे दल भी मुख्यविपक्षी भाजपा के साथ खड़े दिखे। दरअसल ये माना जाता है की जब सरकार अपनी नीतियों पर पूरी तरह विफल हो जाती है तो विपक्ष ही कड़े तेवर दिखाकर सरकार को राह दिखाता है। और हो भी क्यों न आखिर विपक्ष की भी तो कुछ जिम्मेदारियां होती हैं आसमान छूती महंगाई और पेट्रो पदार्थों के बढ़ते दामो ने जनता का जीना दूभर कर दिया है।। तो इस बात से क्या ये समझा जाना छाहिये की सारा विपक्ष जनता के खातिर सरकार पर वार कर रहा है या सिर्फ महंगाई के मुददे पर ही सरकार को घेर रहा है। दरअसल महंगाई एक ऐसा मुद्दा है जो हर राजनीतिक दल को किसी न किसी रूप से फायदा पहुंचता है । पश्चिम बंगाल में अगले साल चुनाव हैं और ममता के बड़ते कद को देखकर वामदल महंगाई पर ही सरकार को घेरकर कुछ फायदा लेना चाहते हैं। यही हाल सपा और राजद जैसे दलों का भी है जो सिर्फ महंगाई का राजनीतिक लाभ लेने के लिए भाजपा के साथ हैं । रही बात भाजपा की तो पार्टी को अब जाकर होश आया की जनता महंगाई से पिस रही है। पिछले साल से ही महंगाई आसमान छू रही है लेकिन भाजपा ने कभी भी सरकार पर इसे कम करने का दबाव नहीं बनाया।
दीगर बात है की जैसे ही विपक्षियों ने सरकार को बजट सत्र में ढीला देखा सब के सब एकजुट हो गए और यहाँ तक की बजट सत्र में पहली बार सदन से वाकआउट भी किया । लेकिन जरा अब हट कर देखें तो जैसे ही सरकार ने महिला आरक्षण बिल को सदन में लाने की बात की तो सारा विपक्ष अलग थलग पर गया । हालांकि भाजपा और वामदलों ने इस मुद्दे पर सरकार का साथ होकर अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया तो सपा और राजद ने बिल का विरोध कर ये दिखा दिया की वो सिर्फ राज्यों की राजनीति ही कर सकती हैं । महिलाओं के विषय पर उन्होंने अपनी छुद्र मानसिकता को भी दरसाया है। संसद के एक ही सत्र में अपने स्वार्थ के लिए एकजुट विपक्ष ने महिला आरक्षण बिल पर अछानक यू टर्न ले लिया।