संसद में इस बजट सत्र में कुछ अजीबोगरीब हालत देखने को मिले । जिस बात की कभी आशंका नहीं की जाती थी महंगाई ने वो सब कर दिखाया। कल तक एक दूसरे के धुर विरोधी रहे भगवा ब्रिगेड और वाम दल अचानक मांगे के मुद्दे पर एकजुट दिखे । यही नहीं इस मुददे पर समाजवादी पार्टी और राजद जैसे दल भी मुख्यविपक्षी भाजपा के साथ खड़े दिखे। दरअसल ये माना जाता है की जब सरकार अपनी नीतियों पर पूरी तरह विफल हो जाती है तो विपक्ष ही कड़े तेवर दिखाकर सरकार को राह दिखाता है। और हो भी क्यों न आखिर विपक्ष की भी तो कुछ जिम्मेदारियां होती हैं आसमान छूती महंगाई और पेट्रो पदार्थों के बढ़ते दामो ने जनता का जीना दूभर कर दिया है।। तो इस बात से क्या ये समझा जाना छाहिये की सारा विपक्ष जनता के खातिर सरकार पर वार कर रहा है या सिर्फ महंगाई के मुददे पर ही सरकार को घेर रहा है। दरअसल महंगाई एक ऐसा मुद्दा है जो हर राजनीतिक दल को किसी न किसी रूप से फायदा पहुंचता है । पश्चिम बंगाल में अगले साल चुनाव हैं और ममता के बड़ते कद को देखकर वामदल महंगाई पर ही सरकार को घेरकर कुछ फायदा लेना चाहते हैं। यही हाल सपा और राजद जैसे दलों का भी है जो सिर्फ महंगाई का राजनीतिक लाभ लेने के लिए भाजपा के साथ हैं । रही बात भाजपा की तो पार्टी को अब जाकर होश आया की जनता महंगाई से पिस रही है। पिछले साल से ही महंगाई आसमान छू रही है लेकिन भाजपा ने कभी भी सरकार पर इसे कम करने का दबाव नहीं बनाया।
दीगर बात है की जैसे ही विपक्षियों ने सरकार को बजट सत्र में ढीला देखा सब के सब एकजुट हो गए और यहाँ तक की बजट सत्र में पहली बार सदन से वाकआउट भी किया । लेकिन जरा अब हट कर देखें तो जैसे ही सरकार ने महिला आरक्षण बिल को सदन में लाने की बात की तो सारा विपक्ष अलग थलग पर गया । हालांकि भाजपा और वामदलों ने इस मुद्दे पर सरकार का साथ होकर अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया तो सपा और राजद ने बिल का विरोध कर ये दिखा दिया की वो सिर्फ राज्यों की राजनीति ही कर सकती हैं । महिलाओं के विषय पर उन्होंने अपनी छुद्र मानसिकता को भी दरसाया है। संसद के एक ही सत्र में अपने स्वार्थ के लिए एकजुट विपक्ष ने महिला आरक्षण बिल पर अछानक यू टर्न ले लिया।
Friday, March 5, 2010
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